गढ़वाली-कुमाऊंनी मूल निवासियों को जनजातीय दर्जा देने की मांग तेज, अल्मोड़ा में उत्तराखंड एकता मंच की हुंकार
रिपोर्टर: रमेश जोशी
उत्तराखंड एकता मंच ने कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्र के मूल निवासियों को देश के अन्य हिमालयी राज्यों की तरह जनजातीय (Tribal) दर्जा देने की मांग को लेकर अल्मोड़ा में जोरदार आवाज उठाई। मंच के पदाधिकारियों का कहना है कि उत्तराखंड के पर्वतीय समाज को इस अधिकार से वंचित रखकर उनके साथ ऐतिहासिक अन्याय किया गया है।
अल्मोड़ा स्थित प्रेस क्लब में आयोजित पत्रकार वार्ता के दौरान मंच के प्रतिनिधियों ने पर्वतीय मूल निवासियों को संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग की। मंच के वरिष्ठ पदाधिकारी दरबान सिंह सुगड़ा ने कहा कि वर्ष 1972 तक उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में जनजातीय कानून प्रभावी थे, लेकिन बाद में इन्हें समाप्त कर दिया गया। उन्होंने दावा किया कि देश के 12 हिमालयी राज्यों के मूल निवासियों को जनजातीय दर्जा प्राप्त है, जबकि गढ़वाली और कुमाऊंनी समुदाय आज भी इस अधिकार से वंचित है।
उत्तराखंड एकता मंच के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र रावत ने कहा कि वर्ष 1974 तक पर्वतीय समाज को अपने जल, जंगल और जमीन पर व्यापक अधिकार प्राप्त थे। उनके अनुसार इन अधिकारों को समाप्त किए जाने के बाद पहाड़ के लोगों का संसाधनों पर नियंत्रण कमजोर हुआ। उन्होंने कहा कि जनजातीय दर्जा मिलने से पर्वतीय क्षेत्रों के युवाओं को शिक्षा, रोजगार और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ मिल सकेगा।
मंच का कहना है कि जनजातीय दर्जा मिलने के बाद स्थानीय समुदाय को जल, जंगल और जमीन पर पारंपरिक अधिकार पुनः प्राप्त होंगे। साथ ही पेसा एक्ट (PESA Act) लागू होने से ग्राम सभाओं को अधिक अधिकार मिलेंगे। संगठन का दावा है कि इससे मूल निवास 1950 और मजबूत भू-कानून जैसी व्यवस्थाओं को भी मजबूती मिलेगी तथा उत्तराखंड की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त होगा।
पत्रकार वार्ता में मंच के संयोजक अनूप बिष्ट और निशांत रौथाण ने घोषणा की कि इस मांग को व्यापक जन-आंदोलन का रूप दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि जनजातीय दर्जे के मुद्दे को राज्य के हर गांव और हर परिवार तक पहुंचाया जाएगा। साथ ही प्रदेश के सभी राजनीतिक दलों से आगामी चुनावी घोषणापत्र में इस मांग को शामिल करने की अपील की जाएगी।